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नई दिल्ली2 घंटे पहले

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बाबूराम भट्टराई 2011 से 2013 तक नेपाल के प्रधानमंत्री रहे। वे इन दिनों नई दिल्ली में हेल्थ चेकअप के लिए आए हैं। (फाइल)

नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई के मुताबिक, भारत में कुछ लोगों की यह धारणा गलत है कि नेपाल पूरी तरह से चीन के पाले में चला गया है। भट्टराई का कहना है कि भारत और नेपाल के रिश्ते ऐतिहासिक और सांस्कृतिक हैं। भारत का स्थान कोई नहीं ले सकता।

भट्टराई इन दिनों नई दिल्ली में हैं। वे यहां हेल्थ चेकअप के लिए आए हैं। वे 2011 से 2013 तक नेपाल के प्रधानमंत्री रहे।

दोनों देशों के रिश्ते मजबूत
न्यूज एजेंसी से बातचीत में बाबूराम ने नेपाल की सियासत, राजनीतिक स्थिरता, भारत और चीन से जुड़े कुछ अहम सवालों के जवाब दिए। एक सवाल के जवाब में भट्टराई ने कहा- दिल्ली में कुछ लोग सोचते हैं कि नेपाल पूरी तरह चीन की तरफ झुक गया है या उसके पाले में चला गया है। यह सही नजरिया नहीं है। ऐतिहासिक तौर पर तो हम भारत के ही करीब हैं। चीन भी हमारा दोस्त है, लेकिन उनसे हमारी नजदीकियां इसलिए भी ज्यादा नहीं हैं क्योंकि वो हिमालय के दूसरी तरफ हैं।

मुश्किल दौर में है नेपाल
नेपाल में संसद भंग है और सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इसे फिर बहाल करने के आदेश दिए हैं। केपी शर्मा ओली प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़ने तैयार नहीं हैं। उनकी इसी जिद की वजह से पार्टी में बंटवारा हो चुका है। राजनीतिक अस्थिरता के बारे में पूछे गए सवाल पर भट्टराई ने कहा- हमारा देश मुश्किल दौर से गुजर रहा है। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी ने बहुमत से सरकार बनाई, लेकिन अब यह दो हिस्सों में बंट गई है। अगर संसद का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उसे भंग कर दिया जाएगा तो यह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है।

भारत से बातचीत जरूरी
भारत और नेपाल के बीच तनावपूर्ण रिश्तों पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में भट्टराई ने कहा- दोनों देशों के बीच हाईलेवल बातचीत नहीं हो पा रही है। भाजपा 2014 में सत्ता में आई। करीब-करीब इसी वक्त नेपाल में डेमोक्रेसी की शुरुआत हुई। मैं ये मानता हूं कि अगर उच्च स्तरीय बातचीत हुई तो रिश्ते सामान्य किए जा सकते हैं। नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता की एक वजह यह भी है कि वहां लोकतंत्र काफी देर से आया। अब हम वहां इसके लिए कोशिश कर रहे हैं।

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