फाइल फोटो

(अपूर्वा मंडाविली​​​​​​​). दुनिया में जैसे-जैसे कोरोना वैक्सीन का दौर शुरू हो रहा है वैसे-वैसे इसके खिलाफ दुष्प्रचार भी जोर पकड़ रहा है। रिपब्लिकन सांसद रैंड पॉल ने एक विवादास्पद बयान में कहा था कि फाइजर और मॉडर्ना की वैक्सीन 90 से 94.4 फीसदी असरदार है। वहीं, एक बार संक्रमित होकर ठीक होने से 99.99 फीसदी सुरक्षा मिलती है। रैंड पॉल उन लोगों में शामिल हैं जो लॉकडाउन के कारण हो रहे आर्थिक नुकसान को देखते हुए चाहते थे कि ज्यादा से ज्यादा लोग बाहर निकलें और वैश्विक महामारी कोरोना वायरस से संक्रमित होने का जोखिम उठाएं।
न्यूयॉर्क टाइम्स ने इस बारे में विशेषज्ञों की राय जानने की कोशिश की। ज्यादातर का कहना है कि वे इस बारे में आश्वस्त नहीं हैं कि कौन सा तरीका ज्यादा असरदार होगा। संक्रमित होना या टीका लगवाना। लेकिन, यह तय है कि टीका लगवाना सुरक्षित है। संक्रमितों में किसकी जान जाएगी और किसकी बचेगी यह जान पाना मुश्किल है। साथ ही हर संक्रमित में एक जैसी इम्युनिटी डेवलप नहीं होती है।

अलग-अलग कोरोना संक्रमितों में बनने वाले एंटीबॉडी की संख्या में 200 गुना तक का अंतर देखा जा रहा है। जो लोग गंभीर रूप से बीमार पड़ते हैं उनमें अधिक इम्युनिटी बनती है। एसिम्पटोमैटिक या हल्के बीमार लोगों में बनी इम्युनिटी कुछ महीने में कमजोर पड़ने लगती है। इस लिहाज से वैक्सीन काफी बेहतर विकल्प है। विशेषज्ञों का कहना है कि निमोनोकॉकल बैक्टीरिया जैसे कुछ पैथोजन रहे हैं, जिनमें देखा गया है कि वैक्सीन से मिलने वाली इम्युनिटी प्राकृतिक इम्युनिटी की तुलना में ज्यादा मजबूत होती है। अब तक मिले साक्ष्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि कोविड-19 के मामले में भी ऐसा ही होगा। एक्सपर्ट्स का कहना है कि मॉडर्ना जैसी वैक्सीन के ट्रायल में यह देखा गया कि इससे कोरोना संक्रमण की तुलना में ज्यादा एंटीबॉडी बनते हैं।

 

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